Monday, July 20, 2009

सभ्यता

गिरते हुए दरख्तों का कहना क्या
मैंने टूटे हुए दिलों को देखा है ,
शाख फिर से महक सकती है
मैंने बिखरते हुए इंसान को देखा है ,
कोयल की कूक पपीहे की पीऊ पीऊ मत सुनाओ
मैंने बच्चो को भूख से रोते हुए देखा है ,
शब्द मानव को बहका सकते हैं
मैंने शब्दों के अर्थों को बदलते हुऐ देखा है ,
रात और दिन दरख्तों के साथ रहती हूँ -
मनुष्य को जंगली होते हुये देखा है
जंगल में रहकर भी सभ्यता महसूस की ,
पर शहरों मैं जंगल राज होते हुए देखा है

2 Comments:

At July 20, 2009 at 3:32 PM , Blogger ओम आर्य said...

bahut hi sundar bhaw

 
At July 22, 2009 at 7:51 PM , Blogger आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' said...

करुणा जी!

स्पष्ट भावाभिव्यक्ति, प्रांजल भाषा और संक्षिप्तता आपका वैशिष्ट्य है. मुझे लगता है सिर्फ देखना पर्याप्त नहीं, जो सही है उसे सराहना, उसके साथ खड़े होना तथा जो गलत हो उसे नकारना जरूरी है. जो समर्थ हैं वे सिर्फ दर्शक हैं यही त्रासदी है.

 

Post a Comment

Subscribe to Post Comments [Atom]

<< Home