Tuesday, August 25, 2009

मौत आई तो जिंदगी से प्यार हो गया


सफर जिंदगी का सुनसान होता गया -

हर वतन ख़ुद-व्-ख़ुद वीरान लगता रहा ,

चमन में फूल खिलते रहे ,महकते रहे -

माली चमन का थकन महसूस करता रहा

फूल चुनने थे मगर कांटे मिलते रहे -

हम तरसते रहे ये जग हँसता रहा ,

थक गएथे हमीं जिंदगी से मगर -

मौत आई तो जिंदगी से प्यार हो गया

सूने दिल में दर्द महसूस करते रहे

प्यासे होकर अंधेरे में तड़फते रहे ,

कोई अपना न था कोई गैर न था -

फ़िर भी अपनेपन के लिए हम तरसते रहे ,

मौत आती है झटके से तो दर्द नहीं होता

मौत क्या है यह पूछो उससे जो इंतज़ार करता रहा है ,

जिंदगी की कीमत बहुत बड़ी है ना जानते थे हम -

मौत के करीब गए तो जिंदगी से प्यार हो गया................

6 Comments:

At August 25, 2009 at 11:57 PM , Blogger विपिन बिहारी गोयल said...

कोई अपना न था कोई गैर न था -

फ़िर भी अपनेपन के लिए हम तरसते रहे

अति सुंदर

तेज धूप का सफ़र

 
At August 26, 2009 at 12:04 AM , Blogger Mithilesh dubey said...

सुन्दर अभिव्यक्ती। लाजवाब रचना

 
At August 26, 2009 at 6:22 AM , Blogger वाणी गीत said...

मौत के करीब आये तो जिंदगी से प्यार हो गया ...हो ही जाता है ..जब दामन छुटने लगता है तब उस पर कौन था ...उसकी अहमियत सामने आती है ..
अच्छी रचना ...!!

 
At August 26, 2009 at 8:20 AM , Blogger Udan Tashtari said...

क्या बात है!!

 
At August 28, 2009 at 9:51 PM , Blogger प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

सुन्दर रचना....बहुत बहुत बधाई....

 
At September 1, 2009 at 1:56 AM , Blogger शरद कोकास said...

भाव अच्छे है लेकिन इन्हे कविता की शक्ल मे ढालने के लिये थोड़ा प्रयास करना होगा ।

 

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