Saturday, July 25, 2009

याद हरियाली तीज की

ये सावन की ऋतू बहुत अजीब होती है ,
साजन के बिना एक उजड़ा रकीब होती है
हर गिरती बरसात की बूंद तन को भिगोती है ,
साजन न हो तो दर्द से भरे मन को भिगोती है
हरियाली को देखकर मन मचल -मचल जाता है ,
ठंडी बयार से आँचल नम हो जाता है
सखियों के साथ झूला झुलना याद आता है ,
बचपन का वह सावन माँ का प्यार याद आता है
वह अल्हड से दिन थे हम जवानी की राह तकते थे ,
आज जवानी में वह अल्हड बचपन याद आता है
चूडी से भरे हाथ मेंहदी से रचे थे ,
झूले की पेंग बढ़ाते हम आगे ही बढे थे
आज टी वी की संस्कृति में खोये सावन को देखकर ,
वह पुराना गाँव का सावन याद आता है
वह वक्त बड़ा अजीज लगता है ,जो हमने महसूस किया ,
क्या याद करेंगे यह बच्चे ,हमें अपना ज़माना याद आता है
थोड़ा मेहंदी का रंग ,चूडियाँ ,हरियाली के गीत इनको भी दो ,
कहीं रुक न जाए यह तीज इसकी महक इनको भी दो
महरूम हो गए हैं खुशियों के रंग से आज ये सब ,
इस उजड़ी सभ्यता को त्योहारों का कुछ नूर भी दो
क्या याद करेंगे ये बच्चे अपनी जवानी के दिनों में ,
हमें तो गाँव की गलियों का बचपन याद आता है -बचपन याद आता है ........

Monday, July 20, 2009

सभ्यता

गिरते हुए दरख्तों का कहना क्या
मैंने टूटे हुए दिलों को देखा है ,
शाख फिर से महक सकती है
मैंने बिखरते हुए इंसान को देखा है ,
कोयल की कूक पपीहे की पीऊ पीऊ मत सुनाओ
मैंने बच्चो को भूख से रोते हुए देखा है ,
शब्द मानव को बहका सकते हैं
मैंने शब्दों के अर्थों को बदलते हुऐ देखा है ,
रात और दिन दरख्तों के साथ रहती हूँ -
मनुष्य को जंगली होते हुये देखा है
जंगल में रहकर भी सभ्यता महसूस की ,
पर शहरों मैं जंगल राज होते हुए देखा है

Sunday, July 19, 2009

रिश्ते

रिश्ते जन्म के साथ ही जन्म लेते हैं -
यह कोई बदन में पहने कपड़े तो नहीं -
जिन्हें खोल दे ,
या बदल डाले ,
यह ओढा हुआ दुपट्टा तो नहीं ,
जो उतार डाले ,
ना ही यह वह सिलाई है ,
जिन्हें उधाड़ डाले ,
यह तो वो सच्चाई होते हैं -
जिन्हें हम जीवन भर ढोते हैं
रिश्ते चाहें छोटे हों या बड़े ,
अगर बोझ बन जाएँ तो सहने मुश्किल हैं ,
पर मजबूरी आपकी कि सहने पड़ते हैं
जब रिश्तों में जुम्बिश ख़त्म हो जाती है ,
तो जीवन नय्या डगमगाती है ,
और हम मन ही मन एक -
नए रिश्ते की खोज में -
चल पड़ते हैं उस वीराने की ऑर -
जहाँ हमें सिर्फ़ परछाई ही दिखाई देती है ,
जो रिश्तों की अवधारणा बनती है
डूबे हुए उन रिश्तों की लाशों पर ,
एक नए रिश्ते की इमारत खड़ी होती है
हम बिना किसी परिणाम की चिंता किए ,
उस रिश्ते में मगरूर हो जाते हैं -
इस तरह जीवन चलता ही रहता है ,
अंत में जीवन रिश्तों में खो जाता है .....
रिश्तों में खो जाता है ..........................

Thursday, July 16, 2009

सुकून

आफताब से रौशनी चुराकर -
तुम्हारे लिए रौशनी का दिया जलाया है ,
तुम मुझे अपना मानो न मानो -
मैंने तुम्हें अपना बनाया है
वह सितम वह जलवे जो ढाए थे तुमने
मैंने उन्हें गले लगाया है ,
चाँद के चहरे पर दाग है लेकिन -
तुम्हारे दाग को मैंने धुलाया है
वह ओस की बूंद जो ठंडक पहुंचाती थी कभी
आज तुमने ही उसे मिटाया है ,
क्यों ढाते हो जुल्मों सितम इस मासूम दिल पर -
मैंने अपनी हस्ती को तुम्हारे लिए मिटाया है
थक गए हैं हम इस कश्मकश को निभाते हुए -
तुमने हर तीर हमारे दिल पर चलाया है
यह करुणा का सागर अथाह प्यार से भरा है -
आज दिल खोलकर तुमने इसमें नहाया है
ज़ब कभी तन्हा याद करोगे इस लम्हे को -
तो दावा है तड़प जाओगे ज़रूर -
हमें फख्र है कि हर दिन हम तड़फते रहे हैं -
लेकिन कम से कम एक दिन हमने तुम्हें तडफाया है

Sunday, July 5, 2009

आज का सत्य

औरत जीत कर भी अपना सब कुछ हार जाती है ,

मर्द हारकर भी सब कुछ जीतता रहता है

जिंदगी औरत की बड़ी कठिन है ,

जो इन्तजार के साए में ही पली है

माँबाप भाई के कठिन अनुशासन में पलकर -

हर वक्त सहमी सी जो बड़ी हुई है

ब्याह कर गई जब वह ससुराल -

तो हमेशा वहां के कायदों में ही उलझी रही है

माँ मारकर अपना भावनाओं से लड़कर ,

दूसरों के आधीन रहकर उलझनों से उबरती रही है

बच्चों और पति के लिए कर देती है जीवन अर्पण ,

पर क्या कोई शह औरत को समर्पित की गई है

आज बातें औरत की मुक्ति की करते हैं ,

पर इसी युग में औरत सबसे ज्यादा उजाड़ी गई है

हर क्षेत्र में उचाइयों को छूने पर भी ,

औरत की लाज सबसे ज्यादा लुटाई गई है

स्त्री -धन नाम था दहेज़ का उस युग में ,

पर दहेज़ के नाम पर सबसे ज्यादा जलाई गई है

पहले कभी-कभी सुनते थे युवा लडकी की लाज लुटी है ,

पर अब अबोध ,नादाँ ,बूढी ,युवा सभी ने लाज लुटाई है

पहले घर था बहुत सुरक्षित लडकी के लिए ,

अब तो घर में भी लडकी ने लाज लुटाई है